दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर
नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने प्रेम संबंधों में POCSO कानून लागू किए जाने के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि हर ऐसे मामले को स्वतः यौन अपराध मान लेना उचित नहीं है और इस विषय पर राज्यों का पक्ष जानना आवश्यक है।
किशोर संबंधों को लेकर अदालत की चिंता
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि कई मामलों में किशोर और किशोरियां अपनी इच्छा से एक-दूसरे के साथ रहने का निर्णय लेते हैं। बाद में परिजनों की शिकायत के आधार पर लड़के के खिलाफ POCSO के तहत मामला दर्ज हो जाता है। अदालत का मानना है कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों का गहराई से आकलन किया जाना चाहिए।
कानून के उद्देश्य को बनाए रखने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम बच्चों को यौन शोषण और अन्य गंभीर अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। इसलिए इसका इस्तेमाल उन्हीं मामलों में होना चाहिए, जहां वास्तव में शोषण, दबाव या अपराध के स्पष्ट संकेत मौजूद हों।
राज्यों से मांगे सुझाव
पीठ ने राज्यों से पूछा कि सहमति वाले किशोर संबंधों और वास्तविक यौन अपराधों के मामलों में अंतर करने के लिए क्या प्रभावी व्यवस्था बनाई जा सकती है। अदालत ने कहा कि इस विषय पर सभी राज्यों से विस्तृत सुझाव और जवाब प्राप्त किए जाएंगे।
संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत
अदालत ने संकेत दिया कि कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है, लेकिन उसके प्रयोग में संतुलन भी जरूरी है। यदि हर सहमति वाले किशोर संबंध को समान रूप से आपराधिक मामला माना जाएगा, तो इससे कानून की मूल भावना और न्याय दोनों प्रभावित हो सकते हैं।