दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर (सतपाल शर्मा)
न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर शुरू हुआ मजदूरों का आंदोलन अब तेज होता जा रहा है। नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में हुए हिंसक प्रदर्शनों की गूंज अब दिल्ली तक पहुंच गई है। इस बीच National Campaign Committee for Eradication of Bonded Labour (NCCEBL) ने दिल्ली सरकार को पत्र लिखकर मजदूरी दरों में तत्काल बढ़ोतरी की मांग की है।
दिल्ली सरकार को पत्र, तुरंत नई दरें घोषित करने की मांग
कमेटी ने मुख्यमंत्री Rekha Gupta, श्रम मंत्री, श्रम सचिव और प्रमुख सचिव को भेजे पत्र में कहा है कि मजदूरों की जायज मांग को गंभीरता से लिया जाए। संगठन ने मांग की है कि 2026 की नई न्यूनतम मजदूरी दरों की घोषणा बिना देरी के की जाए, ताकि हजारों गरीब और प्रवासी मजदूरों को राहत मिल सके।
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि हर साल 1 अप्रैल तक नई मजदूरी दरें घोषित हो जाती हैं, लेकिन इस बार देरी से मजदूरों को नुकसान हो रहा है। खासकर दिहाड़ी और प्रवासी मजदूर, जो बार-बार काम की जगह बदलते हैं, उन्हें बढ़ी हुई मजदूरी का लाभ नहीं मिल पा रहा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
कमेटी ने अपनी मांग को मजबूत करते हुए Secretary vs. Management of Reptakos Brett & Co. Ltd. के 1992 के फैसले का हवाला दिया है। इसमें न्यूनतम मजदूरी तय करने के स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए थे, जिनके आधार पर मजदूरों को उचित वेतन मिलना चाहिए।
नोएडा में हिंसक प्रदर्शन, सड़कें जाम
इससे पहले 13 अप्रैल को नोएडा और ग्रेटर नोएडा के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों ने उग्र प्रदर्शन किया।
- कई जगहों पर सड़क जाम
- पथराव और वाहनों में आगजनी
- पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे
- दिल्ली-नोएडा बॉर्डर पर भारी ट्रैफिक जाम
हालात को काबू में करने के लिए पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी।
हरियाणा के फैसले से बढ़ा दबाव
मजदूरों के इस आंदोलन के पीछे एक बड़ा कारण Haryana सरकार का फैसला है। हरियाणा ने 1 अप्रैल 2026 से न्यूनतम मजदूरी में करीब 35% बढ़ोतरी की है।
इसी के बाद नोएडा के मजदूरों ने भी समान बढ़ोतरी की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि पड़ोसी राज्य में मजदूरी बढ़ने के बावजूद उन्हें पुरानी दरों पर काम करना पड़ रहा है, जो अन्यायपूर्ण है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
मजदूर संगठनों का कहना है कि अगर जल्द ही नई मजदूरी दरों की घोषणा नहीं की गई, तो आंदोलन और उग्र हो सकता है। ऐसे में दिल्ली सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है—एक तरफ मजदूरों की मांग, तो दूसरी ओर कानून-व्यवस्था बनाए रखने का दबाव।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार कब तक इस मुद्दे पर फैसला लेती है।