दोआबा न्यूजलाइन । जालंधर
पंजाब में बच्चों की गुमशुदगी के मामले लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले दो वर्षों में राज्यभर में 1,000 से अधिक बच्चों के लापता होने के मामले सामने आए हैं। इनमें जालंधर, लुधियाना, अमृतसर, पटियाला, मोहाली और बठिंडा जैसे जिले भी शामिल हैं। हालांकि पुलिस बड़ी संख्या में बच्चों को उनके परिवारों तक पहुंचाने में सफल रही है, लेकिन कई बच्चे अब भी लापता हैं। हाल ही में चलाए गए विशेष अभियानों में भी बड़ी संख्या में बच्चों को बरामद किया गया, जिससे समस्या की गंभीरता सामने आई है।
जालंधर में भी हर साल दर्ज हो रहे गुमशुदगी के मामले
जालंधर कमिश्नरेट और ग्रामीण पुलिस के पास भी हर वर्ष बच्चों के गुम होने की शिकायतें दर्ज होती हैं। इनमें स्कूली छात्र-छात्राओं और किशोरियों के मामले अधिक सामने आते हैं। पुलिस कई मामलों में बच्चों को कुछ ही दिनों में ढूंढ लेती है, जबकि कुछ मामलों में दूसरे राज्यों तक तलाश अभियान चलाना पड़ता है। हाल ही में जालंधर पुलिस ने जम्मू-कश्मीर के कठुआ से दो नाबालिग लड़कियों को सुरक्षित बरामद कर परिजनों को सौंपा था।
विशेष अभियान में 195 बच्चे मिले
पंजाब सरकार और पुलिस ने बच्चों की तलाश के लिए “प्रोजेक्ट जीवन ज्योत-2” अभियान चलाया। इस अभियान के दौरान महज 11 दिनों में 195 बच्चों को सुरक्षित बरामद किया गया। इनमें भीख मंगवाने, बाल श्रम और अन्य परिस्थितियों में मिले बच्चों को बाल संरक्षण इकाइयों की मदद से सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।
लुधियाना के आंकड़े सबसे ज्यादा चिंता बढ़ाते हैं
आरटीआई से सामने आए आंकड़ों के अनुसार, केवल लुधियाना जिले में वर्ष 2020 से अब तक 506 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 294 बच्चों को ढूंढ लिया गया, जबकि 212 बच्चे अब भी लापता हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि एक जिले के आंकड़े इतने गंभीर हैं तो पूरे पंजाब की स्थिति का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
क्यों गुम हो रहे हैं बच्चे
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, बच्चों के घर छोड़ने के पीछे कई कारण सामने आते हैं। इनमें परिवार से नाराजगी, सोशल मीडिया के जरिए अजनबियों से संपर्क, प्रेम संबंध, परीक्षा का तनाव, बाल श्रम, मानव तस्करी और आर्थिक शोषण प्रमुख हैं। कई मामलों में बच्चों को बहला-फुसलाकर दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है, जिसके कारण जांच लंबी हो जाती है।
तकनीक की मदद से हो रही तलाश
पंजाब पुलिस अब सीसीटीवी कैमरों, मोबाइल लोकेशन, साइबर सेल, रेलवे और बस अड्डों की निगरानी तथा अन्य राज्यों की पुलिस के सहयोग से बच्चों की तलाश कर रही है। कई मामलों में सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक की मदद से बच्चों को सुरक्षित बरामद किया गया है।
विशेषज्ञों ने अभिभावकों को दी सलाह
बाल अधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता बच्चों के व्यवहार में बदलाव पर नजर रखें और उन्हें सोशल मीडिया के सुरक्षित उपयोग के बारे में जागरूक करें। यदि कोई बच्चा लापता हो जाए तो पहले 24 घंटे का इंतजार करने के बजाय तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज करानी चाहिए, क्योंकि शुरुआती समय में तलाश की संभावना सबसे अधिक रहती है।
सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बच्चों को बरामद करना पर्याप्त नहीं है। स्कूलों में जागरूकता अभियान, परिवारों की काउंसलिंग, मानव तस्करी पर सख्त कार्रवाई और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना भी जरूरी है। जालंधर समेत पूरे पंजाब में बच्चों की सुरक्षा प्रशासन और समाज दोनों की साझा जिम्मेदारी है।