लोकसभा में संख्या बल के आगे कमजोर पड़ी सरकार
दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर
लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने और संसद की संरचना में बदलाव से जुड़े एक अहम संविधान संशोधन प्रस्ताव को सरकार पारित नहीं करा सकी। प्रस्ताव में लोकसभा सीटों की संख्या में बड़े स्तर पर बढ़ोतरी का प्रावधान रखा गया था, लेकिन राजनीतिक मतभेदों और संख्या बल की कमी के कारण यह प्रयास अधूरा रह गया।
लंबी बहस के बाद भी नहीं बनी सहमति
सदन में इस प्रस्ताव पर घंटों तक गहन चर्चा हुई, जिसके बाद मतदान कराया गया। कुल 528 सांसदों ने वोटिंग में हिस्सा लिया, लेकिन समर्थन और विरोध के बीच स्पष्ट विभाजन देखने को मिला। संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत का आंकड़ा हासिल न होने के चलते प्रस्ताव गिर गया।
अधूरी उपस्थिति बनी सबसे बड़ी बाधा
लोकसभा की कुछ सीटें पहले से खाली थीं और मतदान के समय भी कई सदस्य अनुपस्थित रहे। ऐसे में सरकार के लिए जरूरी संख्या जुटाना मुश्किल हो गया। यही कारण रहा कि गणित सरकार के पक्ष में नहीं बैठ पाया।
जुड़े विधेयकों पर भी सरकार ने लगाई रोक
इस घटनाक्रम के दौरान सरकार ने परिसीमन संशोधन और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े दो अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों को भी मतदान के लिए पेश नहीं किया। सरकार का तर्क था कि ये सभी प्रस्ताव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग लाना उचित नहीं होगा।
सत्ता पक्ष के लिए असामान्य स्थिति
पिछले कई वर्षों में यह पहला मौका रहा जब केंद्र सरकार लोकसभा में किसी बड़े प्रस्ताव को पारित कराने में विफल रही। इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में विपक्ष से सहयोग की अपील की थी और प्रस्ताव के महत्व को रेखांकित किया था।
विपक्ष ने बताया लोकतंत्र की जीत
प्रस्ताव के गिरने के बाद विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक संतुलन की जीत बताया। राहुल गांधी ने इसे संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा बताया, जबकि प्रियंका गांधी ने लोकतंत्र की मजबूती से जोड़ा। शशि थरूर ने कहा कि महिला भागीदारी जरूरी है, लेकिन इसे अन्य प्रक्रियाओं से जोड़ना सही नहीं। वहीं एमके स्टालिन ने सरकार पर अहंकार का आरोप लगाया।
संसद के बाहर भी बढ़ा सियासी तापमान
वोटिंग के बाद संसद परिसर में भी माहौल गरमा गया। सत्तारूढ़ गठबंधन की महिला सांसदों ने प्रदर्शन करते हुए इस मुद्दे को महिलाओं के सम्मान से जोड़कर नारेबाजी की, जिससे मामला और संवेदनशील हो गया।
अपीलों के बावजूद नहीं मिला समर्थन
सरकार ने प्रस्ताव को पारित कराने के लिए लगातार विपक्ष से समर्थन मांगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे ऐतिहासिक अवसर बताते हुए समर्थन की अपील की, लेकिन सदन में अपेक्षित संख्या नहीं जुट सकी।
आगे और गहराएगा राजनीतिक टकराव
इस पूरे घटनाक्रम से साफ संकेत मिलते हैं कि आने वाले समय में संसद के ढांचे, महिला प्रतिनिधित्व और परिसीमन जैसे मुद्दों पर राजनीतिक टकराव और तेज हो सकता है, जहां सहमति बनाना आसान नहीं होगा।