दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर
देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को लेकर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। एक तरफ लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा महत्वपूर्ण संशोधन बिल पास नहीं हो सका, वहीं दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश कांग्रेस संगठन में महिलाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करने का मामला सामने आया है।
महिला आरक्षण बिल पर विपक्ष का विरोध, सरकार को झटका
लोकसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाले संशोधन प्रस्ताव को पारित कराने में केंद्र सरकार असफल रही। कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने बिल के खिलाफ मतदान किया, जिसके चलते यह महत्वपूर्ण प्रस्ताव पास नहीं हो पाया। इस बिल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना था।
हिमाचल कांग्रेस में 71 ब्लॉक अध्यक्ष, एक भी महिला नहीं
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस संगठन द्वारा 71 ब्लॉक अध्यक्षों की नियुक्ति की गई, लेकिन इनमें एक भी महिला को मौका नहीं दिया गया। जबकि राज्य की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं, ऐसे में यह फैसला सवालों के घेरे में आ गया है।
जातीय संतुलन दिखा, लेकिन महिला प्रतिनिधित्व गायब
नियुक्तियों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया गया है—SC वर्ग से करीब 24% और ST वर्ग से करीब 11% अध्यक्ष बनाए गए। इसके बावजूद महिलाओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाना संगठन की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर रहा है।
पार्टी के भीतर ही उठे विरोध के स्वर
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विप्लव ठाकुर समेत कई नेताओं ने इन नियुक्तियों पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि फैसले जल्दबाजी और सिफारिशों के आधार पर लिए गए, जिससे जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी हुई है। साथ ही, प्रदेश प्रभारी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए गए हैं कि जमीनी स्तर पर फीडबैक लेने की प्रक्रिया कमजोर रही।
महिला भागीदारी पर नई बहस शुरू
इस पूरे घटनाक्रम ने राजनीति में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दल महिलाओं को सिर्फ वादों तक सीमित रख रहे हैं या उन्हें नेतृत्व में भी बराबरी का मौका देंगे।