दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर
लोकसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका, जिससे केंद्र सरकार को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। बहुमत के लिए जरूरी समर्थन न मिलने के कारण यह बिल आवश्यक संख्या से 54 वोट पीछे रह गया। इस घटनाक्रम ने संसद से लेकर देशभर की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
सत्ता पक्ष ने विपक्ष पर साधा निशाना
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बिल के गिरने पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक विधेयक की हार नहीं, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं की उम्मीदों को ठेस पहुंचाने वाला कदम है। शाह ने विपक्षी दलों पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने राजनीतिक स्वार्थ के चलते महिलाओं के अधिकारों को दरकिनार किया। उनके मुताबिक, इस फैसले का असर आने वाले चुनावों में देखने को मिल सकता है।
विपक्ष ने बताया लोकतांत्रिक जीत
वहीं विपक्षी दलों ने इस पूरे घटनाक्रम को अपनी रणनीतिक जीत बताया है। उनका कहना है कि सरकार इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाने में विफल रही और बिना पर्याप्त चर्चा के बिल को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई। विपक्ष के नेताओं का दावा है कि यह लोकतंत्र की जीत है, जहां बिना सहमति के कोई बड़ा फैसला थोपना संभव नहीं।
12 साल में पहली बार ऐसा झटका
पिछले एक दशक से अधिक समय में यह पहला मौका है जब केंद्र सरकार का कोई महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो पाया। इसे सरकार के लिए एक बड़ा सियासी संकेत माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब महिला सशक्तिकरण को लेकर लगातार दावे किए जा रहे थे।
आगे की राह पर सवाल
इस घटनाक्रम के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इस बिल को दोबारा पेश करेगी या फिर इसमें बदलाव कर सहमति बनाने की कोशिश होगी। वहीं, महिला संगठनों और सामाजिक समूहों की नजर अब इस बात पर है कि राजनीतिक दल इस मुद्दे को आगे कैसे ले जाते हैं।