सबरीमाला, मस्जिदों में एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में खतना और पारसी महिलाओं के अधिकार जैसे 50+ मामलों पर 22 अप्रैल तक सुनवाई
दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर (सतपाल शर्मा)
Supreme Court of India में आज देश की आधी आबादी यानी महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कई अहम मामलों पर सुनवाई शुरू हो रही है। इन मामलों में धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और उनके अधिकारों से जुड़े लंबे समय से लंबित विवाद शामिल हैं।
9 जजों की संविधान पीठ इन याचिकाओं पर 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक अंतिम सुनवाई करेगी। करीब 50 से ज्यादा याचिकाओं में महिलाओं के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव के मुद्दे उठाए गए हैं, जो पिछले 26 वर्षों से अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं।
सबसे अहम मामला Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश का है। कोर्ट यह तय करेगा कि 2018 में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने का फैसला जारी रखा जाए या उसमें बदलाव किया जाए। इस मामले में आज सुबह 10:30 बजे से सुनवाई शुरू हो चुकी है।
सुनवाई के दौरान 7 से 9 अप्रैल तक रिव्यू याचिकाकर्ता अपनी दलीलें देंगे, जबकि 14 से 16 अप्रैल तक विरोध करने वाले पक्ष अपनी बात रखेंगे।
इन प्रमुख मुद्दों पर भी होगा फैसला:
• दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना:
क्या यह प्रथा महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? 2017 में इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
• मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश:
क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है? 2016 में इस मामले पर याचिका दायर की गई थी।
• सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री:
क्या 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को प्रवेश देने का फैसला बरकरार रहेगा या बदलेगा?
• पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार:
क्या गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिलाओं को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है?
इससे पहले जनवरी और फरवरी में हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के बहिष्कार को असंवैधानिक बताया था, जबकि धार्मिक पक्ष ने संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखने की मांग की थी।
कोर्ट ने उस दौरान “आवश्यक धार्मिक प्रथा” (Essential Religious Practices) और न्यायिक समीक्षा की सीमा जैसे अहम सवाल भी उठाए थे। हालांकि, कोविड-19 के चलते सुनवाई बीच में रोक दी गई थी।
अब एक बार फिर शुरू हुई इस सुनवाई को महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन तय करने के लिहाज से ऐतिहासिक माना जा रहा है।