दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर
। पंजाब के सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) को लेकर चल रहे विवाद के बीच भगवंत मान सरकार ने अपने वेतन ढांचे का बचाव किया है। सरकार का कहना है कि भले ही पंजाब में कर्मचारियों को केंद्र के मुकाबले कम प्रतिशत DA मिल रहा हो, लेकिन बेसिक पे और दूसरे भत्तों को जोड़ने के बाद राज्य कर्मचारियों की वास्तविक मासिक आय कई मामलों में केंद्रीय कर्मचारियों से अधिक है।
सरकार ने बताया वेतन का अंतर
कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा, अमन अरोड़ा और डॉ. बलजीत कौर ने चंडीगढ़ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सरकार का पक्ष रखा। वित्त मंत्री चीमा ने केंद्र और पंजाब के कर्मचारियों के वेतन का उदाहरण देते हुए कहा कि केंद्रीय स्तर पर 60 प्रतिशत DA मिलने के बावजूद क्लर्क या कांस्टेबल जैसे पद पर मासिक वेतन करीब 36,960 रुपये बैठता है। इसके विपरीत पंजाब में 42 प्रतिशत DA के साथ इसी स्तर के कर्मचारी को लगभग 54,812 रुपये मिल रहे हैं।
सरकार के मुताबिक इस हिसाब से पंजाब कर्मचारी की मासिक आय केंद्रीय कर्मचारी से करीब 48 प्रतिशत ज्यादा है। यदि पंजाब में DA को भी 60 प्रतिशत कर दिया जाए तो संबंधित वेतन करीब 61,760 रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।
केवल DA प्रतिशत से नहीं होता वेतन का आकलन
सरकार ने तर्क दिया कि कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति का आकलन केवल DA की दर देखकर करना सही नहीं है। इसके लिए बेसिक पे, ग्रेड पे और अलग-अलग भत्तों समेत पूरी वेतन संरचना को देखना जरूरी है।
चीमा के अनुसार पंजाब के कई सरकारी पदों पर मिलने वाला कुल वेतन पड़ोसी राज्यों और केंद्र के समान पदों से अधिक है। सरकार ने क्लर्क, शिक्षक, पुलिस कर्मचारी, ड्राइवर और स्टेनोग्राफर जैसे पदों का उदाहरण देते हुए अपने वेतन ढांचे को ज्यादा लाभकारी बताया।
हरियाणा और दूसरे राज्यों से भी तुलना
सरकार ने पंजाब के कर्मचारियों की आय की तुलना हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों से भी की। दावा किया गया कि कुल वेतन और भत्तों को मिलाकर पंजाब के कर्मचारियों की मासिक प्राप्ति इन राज्यों के कई समान पदों से ज्यादा है।
वित्त मंत्री ने विशेष रूप से गुजरात का उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब के कर्मचारियों का वेतन वहां के समकक्ष कर्मचारियों से लगभग 28 प्रतिशत अधिक बैठता है।
पंजाब में DA कितनी बार बढ़ा?
सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान DA में की गई बढ़ोतरी का भी ब्यौरा दिया। उसके अनुसार सत्ता संभालने के समय कर्मचारियों को 28 प्रतिशत DA मिल रहा था। इसके बाद अक्टूबर 2022 में इसे बढ़ाकर 34 प्रतिशत किया गया।
दिसंबर 2023 में DA 38 प्रतिशत हुआ और नवंबर 2024 में इसे बढ़ाकर 42 प्रतिशत कर दिया गया। सरकार का कहना है कि इस तरह कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से राहत दी गई है।
राजस्व का बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च
वित्तीय स्थिति को लेकर सरकार ने कहा कि पंजाब के राजस्व संसाधनों पर कर्मचारियों के वेतन और पेंशन का काफी बड़ा दबाव है। सरकार के मुताबिक राज्य की कुल राजस्व प्राप्तियों का करीब 51 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च हो रहा है।
सरकार ने दावा किया कि प्रमुख राज्यों में यह अनुपात औसतन करीब 38 प्रतिशत है। वहीं पुराने कर्ज पर ब्याज को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो राज्य की कुल राजस्व प्राप्ति का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा इन दोनों मदों में चला जाता है।
वर्ष 2025-26 में वेतन और पेंशन से संबंधित खर्च करीब 58,064 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान भी सरकार ने सामने रखा।
पुराने बकाये का मुद्दा भी उठा
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पिछली सरकारों के कार्यकाल से चले आ रहे कर्मचारियों के वित्तीय बकाये का मामला भी उठाया गया। वित्त मंत्री ने कहा कि 2016 से 2021 के बीच लागू किए गए संशोधित नियमों से संबंधित करीब 14,191 करोड़ रुपये का एरियर लंबित रहा।
सरकार ने आरोप लगाया कि पिछली सरकारों की ओर से कर्मचारियों को भुगतान करने के वादे किए गए, लेकिन बकाया राशि का निपटारा नहीं किया गया। मौजूदा सरकार का कहना है कि वह इस वित्तीय बोझ से बचने की कोशिश नहीं कर रही, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के अनुसार भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही है।
चार साल की भुगतान योजना का हवाला
सरकार के अनुसार हाईकोर्ट में प्रस्तुत योजना के तहत पुराने बकाये का भुगतान चार वित्तीय वर्षों में करने का रास्ता तय किया गया था। सरकार का दावा है कि इस योजना के तहत अब तक 4,500 करोड़ रुपये से अधिक की राशि कर्मचारियों को दी जा चुकी है।
सरकार का कहना है कि एक साथ पूरा बकाया चुकाने की स्थिति में राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर दबाव पड़ सकता है।
DA को लेकर कानूनी आधार क्या है?
कैबिनेट मंत्री डॉ. बलजीत कौर ने कहा कि राज्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते पंजाब सिविल सर्विसेज रिवाइज्ड पे रूल्स 2021 और संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत निर्धारित होते हैं।
सरकार का तर्क है कि इन नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत केंद्र सरकार द्वारा तय DA की दर पंजाब में स्वतः लागू हो जाए। राज्यों को अपनी आर्थिक स्थिति और वित्तीय क्षमता के आधार पर कर्मचारियों के वेतन एवं भत्तों के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार की प्रमुख दलील
DA और बकाये से जुड़े विवाद में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी अपनी वित्तीय स्थिति का हवाला दिया है। सरकार का कहना है कि 14,191 करोड़ रुपये का लंबित बकाया राज्य के करीब तीन महीने के वेतन-पेंशन खर्च के बराबर है। इसलिए इतनी बड़ी राशि को महज 15 दिनों में जारी करना राज्य की मौजूदा वित्तीय क्षमता के अनुरूप नहीं है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों और राज्य कैडर के कर्मचारियों को एक ही आधार पर देखना उचित नहीं होगा। IAS अधिकारियों की सेवा शर्तें और कई भत्ते केंद्र द्वारा निर्धारित किए जाते हैं, जबकि राज्य कर्मचारियों के लिए अलग नियम लागू होते हैं।
सरकार का ‘इन-हैंड सैलरी’ वाला फॉर्मूला
राज्य सरकार ने अदालत के सामने यह विकल्प भी रखा है कि यदि उद्देश्य कर्मचारियों की वास्तविक मासिक आय को केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर लाना है, तो आवश्यक वित्तीय समायोजन पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि सरकार समान प्रतिशत DA लागू करने के पक्ष में नहीं है। उसका कहना है कि यदि किसी पद पर पंजाब का कर्मचारी पहले ही केंद्रीय कर्मचारी से अधिक कुल वेतन प्राप्त कर रहा है, तो वहां केवल DA प्रतिशत की समानता लागू करने से राज्य पर अतिरिक्त और अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ेगा।
विवाद का केंद्र अब DA प्रतिशत से आगे
इस पूरे विवाद में एक तरफ कर्मचारी केंद्र के 60 प्रतिशत DA का हवाला देकर पंजाब में समान दर की मांग कर रहे हैं, जबकि राज्य सरकार कुल वेतन और ‘टेक-होम’ आय को आधार बनाकर अपना पक्ष रख रही है।
यानी सरकार का मुख्य तर्क यह है कि DA का प्रतिशत अलग होना अपने आप में कम वेतन का प्रमाण नहीं है। उसके अनुसार पंजाब की मौजूदा वेतन संरचना में बेसिक पे और अन्य घटकों के कारण कई कर्मचारियों की कुल मासिक आय केंद्र और अन्य राज्यों के समान पदों से अधिक है। अब इस मामले में अदालत का रुख और आगे होने वाली सुनवाई यह तय करने में अहम होगी कि DA की समानता और राज्य की वित्तीय क्षमता के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है।