दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर
पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच दोबारा सियासी गठजोड़ की चर्चाएं तेज हो गई हैं। दोनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर लगभग सहमति बनने की बात सामने आ रही है। हालांकि गठबंधन को लेकर दोनों पार्टियों की ओर से अभी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। संभावित समझौते के तहत भाजपा 60 और अकाली दल 57 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ सकता है।
मुख्यमंत्री चेहरे की घोषणा के बिना चुनाव लड़ने की तैयारी
सूत्रों के मुताबिक, दोनों दल चुनाव से पहले किसी एक नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के बजाय सामूहिक नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरने की रणनीति बना रहे हैं। चुनाव प्रचार में भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और अकाली दल सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व को प्रमुखता दे सकता है। चुनाव परिणाम के बाद विधायक संख्या और गठबंधन के भीतर बनी सहमति के आधार पर मुख्यमंत्री पद को लेकर फैसला होने की संभावना बताई जा रही है।
अकाली दल के सर्वे ने गठबंधन की जरूरत बताई
अकाली दल की ओर से चुनावी स्थिति को लेकर अलग-अलग चरणों में आंतरिक स्तर पर सर्वे कराए जाने की चर्चा है। इन आकलनों में पार्टी को अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में करीब 30 से 35 सीटों तक सीमित रहने का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में बहुमत तक पहुंचने के लिए गठबंधन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
साथ आने पर 58 से 60 सीटों का अनुमान
आंतरिक आकलन के मुताबिक भाजपा और अकाली दल संयुक्त रूप से मैदान में उतरते हैं तो गठबंधन को करीब 58 से 60 सीटों तक सफलता मिलने की संभावना जताई गई है। यही वजह है कि दोनों दलों के बीच सीटों के तालमेल और चुनावी रणनीति को लेकर बातचीत को अहम माना जा रहा है।
ग्रामीण पंजाब में भाजपा की बढ़ती सक्रियता बनी चर्चा
गठबंधन की रणनीति में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों का समीकरण भी महत्वपूर्ण है। अब तक भाजपा की मजबूत पकड़ मुख्य रूप से शहरी इलाकों में मानी जाती रही है, लेकिन पार्टी ने ग्रामीण विधानसभा क्षेत्रों में भी अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं। दूसरी ओर अकाली दल का पारंपरिक आधार ग्रामीण पंजाब में रहा है। ऐसे में दोनों के साथ आने से वोटों के इस समीकरण को चुनावी लाभ में बदलने की कोशिश होगी।
अकाली दल पुनरसुरजीत गुट को लेकर भी बातचीत
गठबंधन की घोषणा में देरी के पीछे अकाली दल के अलग-अलग धड़ों को साथ लाने की कवायद भी एक कारण बताई जा रही है। भाजपा की कोशिश है कि अकाली दल पुनरसुरजीत गुट को भी गठबंधन के दायरे में लाया जाए। चर्चा है कि भाजपा अपने हिस्से की सीटों में से करीब 8 से 10 सीटें इस गुट के नेताओं के लिए छोड़ सकती है। हालांकि इस पर अंतिम सहमति अभी बाकी मानी जा रही है।
भाजपा की पसंदीदा सीटों पर अकाली नेताओं की दावेदारी
सीट बंटवारे को लेकर सबसे बड़ा पेंच कुछ विधानसभा क्षेत्रों को लेकर बताया जा रहा है। भाजपा की ओर से करीब 60 सीटों की अपनी प्राथमिक सूची अकाली दल के साथ साझा किए जाने की बात कही जा रही है। इनमें कुछ ऐसे क्षेत्र भी शामिल बताए जा रहे हैं, जहां अकाली दल के वरिष्ठ नेता लंबे समय से चुनाव लड़ते रहे हैं। ऐसे में सीटों की अदला-बदली और उम्मीदवारों के राजनीतिक आधार को देखते हुए अंतिम सूची तैयार करने पर मंथन चल रहा है।
घोषणा से पहले दोनों दल संगठन को कर रहे मजबूत
गठबंधन की औपचारिक घोषणा में भले ही समय लग रहा हो, लेकिन दोनों पार्टियां संगठनात्मक स्तर पर अपनी तैयारियां जारी रखे हुए हैं। अकाली दल की ओर से ग्रामीण क्षेत्रों में बैठकों और रैलियों का दौर चल रहा है, जबकि भाजपा शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ गांवों में भी संगठन विस्तार पर जोर दे रही है। माना जा रहा है कि औपचारिक गठबंधन की घोषणा से पहले दोनों दल 117 विधानसभा क्षेत्रों में अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखना चाहते हैं, ताकि किसी भी संभावित सीट समझौते के बाद संगठनात्मक गतिविधियों पर असर न पड़े।
घोषणा के बाद साफ होगी चुनावी तस्वीर
फिलहाल भाजपा और अकाली दल के बीच गठबंधन की चर्चाओं ने पंजाब की चुनावी राजनीति में नए समीकरण की संभावना पैदा कर दी है। 60-57 का संभावित सीट फार्मूला, मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर स्पष्ट रणनीति और सीटों के अंतिम चयन पर चल रही बातचीत आने वाले दिनों में पंजाब की सियासत की दिशा तय कर सकती है। हालांकि अंतिम स्थिति दोनों दलों की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।