दोआबा न्यूजलाइन। जालंधर
पंजाब के दोआबा क्षेत्र की सियासत में इन दिनों भारी हलचल देखी जा रही है। जालंधर में हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के रुख को प्रभावित करने के उद्देश्य से सामने आए हालिया बयानों ने क्षेत्र के राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है। चुनावी रणनीतिकारों द्वारा सामाजिक और धार्मिक समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने की इस नई कोशिश को लेकर शहर के प्रबुद्ध वर्ग और आम जनता के बीच व्यापक चर्चा छिड़ गई है। जानकारों का मानना है कि बुनियादी और विकास से जुड़े मुद्दों के बजाय अब राजनीतिक नैरेटिव को खास समुदायों के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की रणनीति अपनाई जा रही है।
वोट बैंक की सियासत और उपेक्षा का आरोप
इस ताजा घटनाक्रम के केंद्र में यह बात उभरकर सामने आई है कि पारंपरिक राजनीतिक दल किस तरह चुनाव आते ही विशिष्ट मतदाताओं को एक सुरक्षित वोट बैंक के रूप में देखना शुरू कर देते हैं। नए बयानों के जरिए यह संदेश देने की पुरजोर कोशिश की जा रही है कि अब तक विभिन्न वर्गों की राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल सिर्फ सत्ता तक पहुँचने के लिए किया गया है, जबकि जमीनी स्तर पर उनकी वास्तविक समस्याओं को हमेशा नजरअंदाज किया गया। इस तरह की बयानबाजी से एक तरफ जहाँ समुदायों के भीतर अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर सजगता बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ तुष्टीकरण और उपेक्षा के आरोपों ने भी तूल पकड़ लिया है।
स्थानीय मुद्दों बनाम सामाजिक समीकरणों की जंग
जालंधर की जनसांख्यिकी को देखते हुए यहाँ का मुकाबला हमेशा से त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय रहा है, जहाँ शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता बेहद सूझबूझ से फैसला लेते हैं। व्यापार, उद्योग और नागरिक सुविधाओं के लिए पहचाने जाने वाले इस शहर में अचानक धार्मिक और जातिगत गणना को प्राथमिकता दिए जाने से विपक्षी दल भी आक्रामक हो गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि जब भी स्थानीय स्तर पर विकास के मोर्चे पर नाकामियों को छिपाना होता है, तो जानबूझकर ऐसे संवेदनशील मुद्दों को हवा दे दी जाती है ताकि वास्तविक समस्याओं जैसे बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था से जनता का ध्यान भटकाया जा सके।
भाईचारे की साख और भविष्य का चुनावी रुख
दूसरी ओर, जालंधर के नागरिक समाज और स्थानीय संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम पर सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि पंजाब का सामाजिक ताना-बाना हमेशा से आपसी भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द पर टिका रहा है, जिसे किसी भी चुनावी नफा-नुकसान के लिए दांव पर नहीं लगाया जाना चाहिए। फिलहाल, इस नए राजनीतिक नैरेटिव ने पर्दे के पीछे चल रही जोड़-तोड़ को सरेआम उजागर कर दिया है और अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आगामी दिनों में यहाँ की जनता विकास के एजेंडे को चुनती है या फिर इस नए ध्रुवीकरण के जाल में उलझकर रह जाती है।